नयी रे नतैती

Sunday, July 21, 20130 comments

हमारी मौखिक परंपरा है, लिखित नहीं। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी से सीखने-सिखाने का सिलसिला मौखिक ही चलता था। और इसका एक तरीका कविता है, लोकगीत हैं। यह लोकगीत हमें जीने का सलीका भी सिखाते हैं और दिलों को आपस में जोड़ते हैं।

पहले का जितना भी साहित्य है, वह कविता में है, इसका एक कारण पढ़ार्इ-लिखार्इ तब प्रचलन में नहीं थी। किसान खेत-खलिहानों में काम करते हुए, मछुआरे नदी में जाल डालते हुए, महिलाएं हाथ की चक्की से आटा पीसते हुए, बुनकर करघा-चरखा चलाते हुए गीत रचती थी। गाती थीं।

 इसमें नए लोग जुड़ते थे, कुछ नया जोड़ते थे। इसी तरह नदी के बहाव की तरह यह सिलसिला चलता रहता था। यह हमारी धरोहर है। इसे ही संजोने का यह एक प्रयास है।

यह बुंदेली बारहमासी गारी है, जो शादी के समय महिलाएं गाती हैं। खासतौर से नए रिश्तेदारों के स्वागत में और अपने तरीके से समझाइश देते हुए कि यह रिश्ता किस तरह अटूट बना रहेगा। इसमें तीनों मौसम के बारे में वर्णन है।

गीत सुन्ने के लिए प्लेयर चलाये।
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